इतिहास के झरोखे से

जानिये क्यों पड़ा धनपत राय श्रीवास्तव का नाम प्रेमचंद !

उपन्यास के सम्राट और कहानियों के पितामह कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद की आज पुण्यतिथि है।  प्रेमचंद जी का जीवन काल सिर्फ साहित्य को समर्पित रहा है। किताब बेचने वाले की दूकान पर ही बैठ कर प्रेमचंद सारे उपन्यास पढ़ जाया करते थे। साहित्य में रूचि प्रेमचंद की कुछ इस कदर थी की वे 2 से 3 सालों में सैकड़ो किताबें पढ़ गए । प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों का अंत हमेशा दुखद होने के कारण ये बात उन्हें बाकी लखकों से अलग बनाती है। कफ़न , निर्मला , गोदान और गबन जैसी रचनाओं में प्रेमचंद का भारतीय समाज से एक अलग प्रकार का जुड़ाव महसूस होता है। समाज की छोटी छोटी परेशानियों को अपने साहित्य के माध्यम से लोगो के सामने प्रेमचंद रखा करते थे।

प्रेमचंद अपने आस पास हो रहीं घटनाओं को ही कहानियों में लिख दिया करते थे। अगर किसी को ग्रामीण जीवन को करीब से जानना हो तो प्रेमचंद के उपन्यास पढ़ सकते हैं। प्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। 1894  ई० में “होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात” नामक नाटक की रचना की। सन् 1898  में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय “रुठी रानी” नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन 1902 में प्रेमा और सन् 1904 – 05  में “हम खुर्मा व हम सवाब” नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया। 

प्रेमचंद एक संघर्ष  

प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे।  इनका जन्म वाराणसी के निकट लमही गांव में हुआ था। प्रेमचंद के पिता पेशे से डाकमुंशी थे। इनकी शादी 13 वर्ष की उम्र में ही आनंदी बाई से करा दी गयी पर ये शादी ज्यादा दिन तक नहीं चली। प्रेमचंद विधवा विवाह के समर्थक थे। इसीलिए उन्होंने एक उदहारण बनते हुए एक बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह कर लिया। प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे। 

प्रेमचंद का जीवन कुछ इस कदर परेशानियों से भरा था की वे जीवन में सिर्फ नकारात्मकता भर चुकी थी शायद यही कारण था की उनकी कहानियों का अंत हमेशा ही दुखद रहता था। वे केवल 8 वर्ष के थे जब उनकी माँ का निधन हो गया घर में सौतेली माँ के आ जाने से उन पर बुरा प्रभाव पड़ा। अत्यंत गरीबी देखने और  प्रेम , स्नेह के अभाव के कारण प्रेमचंद जी का जीवन बड़े कष्टों में बीता। पर यही कष्ट थे जिन्होंने धनपत राय को प्रेमचंद बना दिया। प्रेमचंद ने 300 से अधिक कहानियां और 50 से अधिक उपन्यास लिखे हैं।  31 जुलाई 1936 को जब उनकी मृत्यु हुई तब वे अपना आखिरी उपन्यास मंगलसूत्र लिख रहे थे। जिसे बाद में उनके पुत्र ने पूरा किया।   

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