यात्रा वृतांत

नर्मदा के चरणों में है प्राकृतिक खूबसूरती

प्राकृतिक खूबसूरती वाले ऐतिहासिक स्थान पर घूमने का मौका मिले तो फिर बात ही क्या? छुट्टी केवल एक दिन की हो तो हरियाली, पानी, प्रकृति और ऐतिहासिक धरोहर का एक साथ मजा लेने के लिए महेश्वर एक बेहतर मुकाम है। इंदौर से 90 की.मी. की दुरी पर “नर्मदा नदी” के किनारे बसा यह खुबशुरत पर्यटन स्थल म.प्र. शासन द्वारा “पवित्र नगरी” का दर्जा प्राप्त है, अपने आप में कला, धार्मिक, संस्कृतिक, व एतिहासिक महत्व को समेटे यह शहर लगभग 2500 वर्ष पुराना हैं। महेश्वर यानि रानी अहिल्या बाई होलकर की नगरी! रानी अहिल्या बाई ने होलकर की राजधानी को इंदौर से नर्मदा किनारे स्थित महेश्वर में स्थानांतरित किया तथा यहीं से उन्होंने शासन किया। भगवान् शिव एवं माँ नर्मदा पर उनकी असीम आस्था थी। ये उनके लिए शक्ति व प्रेरणा का स्त्रोत थे।

महेश्वर एक ऐसी नगरी है जिसमें आप जहां भी जाएँ, आप नर्मदा से कभी दूर नहीं होते। इस शहर को महिष्मती नाम से भी जाना जाता था। महेश्वर का रामायण और महाभारत में भी उल्लेख है। देवी अहिल्याबाई होलकर के कालखंड में बनाए गए यहाँ के घाट सुंदर हैं और इनका प्रतिबिंब नदी में और खूबसूरत दिखाई देता है। महेश्वर इंदौर से ही सबसे नजदीक है। मूलतः यह “देवी अहिल्या” के कुशल शासनकाल और उन्ही के कार्यकाल (1764-1795) में हैदराबादी बुनकरों द्वारा बनाना शुरू की गयी “महेश्वरी साड़ी” के लिए आज देश-विदेश में जाना जा रहा हैं।

अपने धार्मिक महत्त्व में यह शहर काशी के समान भगवान शिव भगवान शिव की नगरी है, मंदिरों और शिवालयो की निर्माण श्रंखला के लिए इसे “गुप्त काशी” कहा गया है। अपने पोराणिक महत्व में स्कंध पुराण, रेवा खंड, तथा वायु पुराण आदि के नर्मदा रहस्य में इसका “महिष्मति” नाम से विशेष उल्लेख है। ऐतिहासिक महत्त्व में यह शहर भारतीय संस्कृति में स्थान रखने वाले राजा महिष्मान, राजा सहस्त्रबाहू (जिन्होंने रावण को बंदी बनाया था) जैसे राजाओ और वीर पुरुषो की राजधानी रहा है, बाद में होलकर वंश के कार्यकाल में इसे प्रमुखता प्राप्त हुई। 

लम्बा-चौड़ा नर्मदा तट एवं उस पर बने अनेको सुन्दर घाट एवं पाषाण कला का सुन्दर चित्र दिखने वाला “किला” इस शहर का प्रमुख पर्यटन आकर्षण है | समय-समय पर इस शहर की गोद में मनाये जाने वाले तीज-त्यौहार, उत्सव-पर्व इस शहर की रंगत में चार चाँद लगाते है, जिनमे शिवरात्रि स्नान, निमाड़ उत्सव, लोकपर्व गणगौर, नवरात्री, गंगादशमी, नर्मदा जयंती, अहिल्या जयंती एवं श्रावण माह के अंतिम सोमवार को भगवान काशी विश्वनाथ के नगर भ्रमण की “शाही सवारी” प्रमुख है|

महेश्वर का धार्मिक महत्व तो जगजाहिर है ही, लेकिन पर्यटन के लिहाज से यहां का किला और ऐतिहासिक घाट भी खासा महत्व रखते हैं। यूं तो यहां साल भर देसी-विदेशी पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है लेकिन छुट्टियों में ज्यादा भीड़ होती है। सप्ताह के आखिरी दिनों के साथ ही स्कूलों की छुट्टियों के मौके पर खासी रौनक रहती है।वहां रुकने और ठहरने के लिए पर्यटन विकास निगम द्वारा आरामदायक और रियायती सुविधाएं उपलब्ध हैं। महेश्वर का किला, सहस्त्रधारा और घाट के साथ काफी कुछ घूमने को है। हैंडलूम प्रोडक्ट्स को लेकर यहां का नाम खास है। राज राजेश्वर भी खास है। मान्यता है कि यहां घी के 11 दीपक (नंदा दीपक) 1100 साल से जल रहे हैं। इन सबके बावजूद बोटिंग करना आपका यहां आना सफल कर देता है। नर्मदा की लहरों पर बोटिंग करने का अलग ही मजा है। 

महेश्वर के दर्शनीय स्थल

महेश्वर एक छोटी सी नगरी है। इसके दर्शन आप एक दिन, अधिक से अधिक दो दिन में पूर्ण कर सकते हैं। सम्पूर्ण नगरी महेश्वर गढ़ के चारों ओर केन्द्रित है। इसके एक ओर नर्मदा नदी कोमलता से बहती है। दूसरी ओर इसके द्वार के बाहर से नगर का आरम्भ होता है। अर्थात् अहिल्या बाई का गढ़ महेश्वर का ह्रदय है।  

अहिल्या बाई का रजवाड़ा

अहिल्या गढ़ अथवा महल 16वी. शताब्दी के प्राचीरों पर बना है जिन्हें संभवतः मुगलों ने बनाया था। यह महल अब एक विरासती होटल है। इसका अर्थ है कि महल के मुख्य भागों के दर्शन तो सब पर्यटक कर सकते हैं किन्तु महल के आवासीय क्षेत्र के दर्शन केवल इस होटल के अतिथी ही कर सकते हैं। यहाँ मैंने अनेक स्थानीय नागरिक देखे जो इस महल में आकर इसे ऐसा सम्मान दे रहे थे मानो यह एक तीर्थ स्थल हो। यह मेरे लिए अत्यंत सुखद आश्चर्य था। महल का रजवाड़ा क्षेत्र एक विशाल निवास स्थान का गलियारा प्रतीत हो रहा था। मध्यवर्ती खुला प्रांगण हरे भरे पौधों से भरा हुआ था। ये पौधे महल को जीवंत करते प्रतीत हो रहे थे। कई लाल एवं श्वेत सूचना पट्टिकायें  होलकर, अहिल्या बाई एवं सम्पूर्ण भारत में महलों के पुनरुद्धार हेतु उनके द्वारा किये गये श्रमों का उल्लेख कर रहे थे।

रानी अहिल्या बाई की गद्दी अथवा न्यायसभा

इन खुले आंगनों में से एक के भीतर रानी अहिल्या बाई की न्यायसभा भरती थी। एक शिवलिंग को हाथ में लिए वे यहीं बैठकर आम जनता की समस्याओं को सुनती एवं उनका निवारण करती थीं। उस काल का वैभव अब भी यहाँ सहेज कर रखा गया है। यहाँ काष्ठ स्तंभों एवं सूती गद्दों से घिरी अहिल्या बाई की एक आदमकद मूर्ति भी है। निःसंदेह यहाँ शासन करने वाली रानी की सादगी का ही यह प्रतिबिंब है। ऊपर अन्य कई होलकर राजाओं के चित्र लटकाए हुए थे। राजवाड़े के परिसर में अहिल्या बाई की एक पालखी है।  इसकी अब भी प्रत्येक सोमवार को बड़े धूमधाम से शोभायात्रा निकाली जाती है। बाहर हाथी, घोडा एवं बैल के एक एक चित्र थे। वे क्रमशः भगवान् शिव का वाहन, होलकरों के कुलदेवता एवं राजसी ठाट के प्रतीक थे। चारों ओर सादगी यहाँ की विशषता प्रतीत हो रही थी।

अहिल्या गढ़ में शिवलिंग पूजन अथवा लिंगार्चन

अहिल्या गढ़ में  यहाँ की एक अनोखी प्रथा जिसका आरंभ स्वयं अहिल्या बाई ने ही किया था। इस प्रथा का आज भी अखंड पालन किया जा रहा है।अहिल्या बाई के समय 108 ब्राम्हण प्रतिदिन, यहाँ की काली मिट्टी से कुल 125000 यानि सवा लाख छोटे शिवलिंग का निर्माण करते थे। उन शिवलिंगों की आराधना कर उन्हें नर्मदा में अर्पित करते थे। वर्तमान में 11 ब्राम्हण प्रत्येक दिवस कुल1500 शिवलिंग बनाते हैं, उनकी पूजा करते हैं एवं नर्मदा के जल में उन्हें अर्पित करते हैं। हर दिन आप यह पूजा प्रातः 8 से 10 बजे तक देख सकते हैं।

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